सागर - आज जलवायु परिवर्तन, जल संकट, बढ़ता तापमान और जैव विविधता का क्षरण पूरी दुनिया के सामने गंभीर चुनौती बनकर खड़ा है। विकास की अंधी दौड़ में प्रकृति के साथ संतुलन बिगड़ने का परिणाम अब पूरी मानवता को भुगतना पड़ रहा है। विश्व पर्यावरण दिवस हमें केवल पर्यावरण संरक्षण का संदेश नहीं देता, बल्कि यह भी स्मरण कराता है कि प्रकृति के बिना मानव सभ्यता का भविष्य सुरक्षित नहीं रह सकता।
विश्व स्तर पर बढ़ती प्राकृतिक आपदाएँ, अनियमित वर्षा, सूखा और बाढ़ जैसी घटनाएँ यह संकेत दे रही हैं कि प्रकृति के साथ संतुलन बनाए बिना विकास की कोई भी अवधारणा दीर्घकालिक नहीं हो सकती। भारत जैसे कृषि प्रधान देश के लिए यह चुनौती और भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहाँ करोड़ों लोगों का जीवन जल, भूमि और प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर है।
भारतीय संस्कृति ने हजारों वर्षों पूर्व ही प्रकृति और मानव के संबंध को समझ लिया था। अथर्ववेद का उद्घोष— "माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः" अर्थात "पृथ्वी मेरी माता है और मैं उसका पुत्र हूँ"— भारतीय जीवनदृष्टि का आधार है। हमारी परंपराओं में नदियाँ केवल जलधाराएँ नहीं, बल्कि जीवनदायिनी मानी गई हैं। वृक्षों को देवतुल्य सम्मान प्राप्त हुआ और वन मानव जीवन के संरक्षण के केंद्र रहे हैं। भारतीय दर्शन का मूल भाव यही है कि मानव और प्रकृति के बीच संघर्ष नहीं, बल्कि सह-अस्तित्व होना चाहिए।
भारतीय परंपरा की यह चेतना आधुनिक भारत के वैज्ञानिक चिंतन में भी स्पष्ट दिखाई देती है। भारत रत्न एवं पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम का मानना था कि किसी राष्ट्र का विकास तभी सार्थक और स्थायी हो सकता है, जब विज्ञान, प्रौद्योगिकी और पर्यावरण के बीच संतुलन बना रहे। उन्होंने विकास के ऐसे मॉडल की वकालत की, जो प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण करते हुए आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित भविष्य सुनिश्चित करे।
आज जब विश्व पर्यावरणीय चुनौतियों का सामना कर रहा है, तब उनका यह दृष्टिकोण और अधिक प्रासंगिक प्रतीत होता है। विश्व के अनेक विकसित देशों में आज पर्यावरण संरक्षण एक नीति का विषय है, जबकि भारत में यह जीवन-पद्धति का हिस्सा रहा है। संयमित उपभोग, जल संरक्षण, जैव विविधता के प्रति सम्मान और प्रकृति के साथ समरस जीवन भारतीय संस्कृति की विशेष पहचान रही है। यही कारण है कि आज पर्यावरणीय संकट के समाधान में विश्व भारत की ओर आशा से देख रहा है। आज आवश्यकता केवल वृक्षारोपण तक सीमित नहीं है। पर्यावरण संरक्षण को जनभागीदारी का विषय बनाना होगा।
प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी द्वारा प्रतिपादित "मिशन लाइफ" इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है, जो पर्यावरण संरक्षण को सरकारी कार्यक्रम के बजाय जन-आंदोलन का स्वरूप देने का प्रयास करता है। यह अभियान प्रत्येक नागरिक को प्रकृति के प्रति उत्तरदायी जीवनशैली अपनाने का संदेश देता है।
मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में जल संरक्षण, वन संवर्धन, वन्यजीव संरक्षण और हरित विकास की दिशा में अनेक प्रयास किए जा रहे हैं। प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण तथा विकास के बीच संतुलन स्थापित करने की यह सोच भविष्य की आवश्यकताओं के अनुरूप है। पर्यावरणीय चुनौतियों के इस दौर में ऐसे प्रयास सतत विकास की दिशा में सकारात्मक संकेत देते हैं।
वास्तव में पर्यावरण संरक्षण किसी एक विभाग, सरकार या संस्था का विषय नहीं है। यह समाज की जीवनशैली, व्यक्ति की संवेदनशीलता और राष्ट्र के चरित्र से जुड़ा हुआ प्रश्न है। जब तक प्रकृति के प्रति उत्तरदायित्व हमारे व्यवहार और संस्कार का हिस्सा नहीं बनेगा, तब तक स्थायी समाधान संभव नहीं होगा। पर्यावरण संरक्षण की शुरुआत बड़े अभियानों से पहले व्यक्ति के दैनिक जीवन से होती है।
विश्व पर्यावरण दिवस का संदेश स्पष्ट है कि विकास और पर्यावरण परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं। प्रकृति का संरक्षण ही संस्कृति का संरक्षण है और संस्कृति का संरक्षण ही मानवता के सुरक्षित भविष्य की आधारशिला है। यदि हमें आने वाली पीढ़ियों को स्वच्छ, सुरक्षित और समृद्ध भारत देना है, तो प्रकृति के साथ संतुलित संबंध स्थापित करना ही होगा।
आज आवश्यकता इस बात की है कि पर्यावरण संरक्षण को केवल एक दिवस तक सीमित न रखा जाए, बल्कि इसे राष्ट्रीय जीवन के संस्कार के रूप में विकसित किया जाए। जब समाज, शासन और नागरिक मिलकर प्रकृति के प्रति अपने दायित्व का निर्वहन करेंगे, तभी विकसित भारत का सपना वास्तव में साकार होगा। प्रकृति का सम्मान ही भविष्य की सुरक्षा है, और यही विश्व पर्यावरण दिवस का वास्तविक संदेश भी ह