गढ़पहरा के हनुमान जहाँ भक्ति, शक्ति और इतिहास का होता है अनूठा संगम ।हनुमान जयंती पर होंगे विशेष आयोजन।



सागर - मध्य प्रदेश के सागर जिले की ऐतिहासिक धरा पर स्थित गढ़पहरा का किला केवल पत्थरों का दुर्ग नहीं बल्कि बल्कि बुंदेलखंड के शौर्य, स्थापत्य कला और अटूट धार्मिक आस्था का जीवंत गवाह है। यहाँ की ऊँची पहाड़ियों पर विराजे हनुमान जी का प्राचीन सिद्ध मंदिर न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि यह क्षेत्र के सामाजिक और सांस्कृतिक ताने-बाने का अभिन्न हिस्सा भी है। यह क्षेत्र प्राचीन दांगी राजाओं की राजधानी रहा है, जहाँ आज भी हवाओं में इतिहास की गूँज और फिजाओं में बजरंगबली की भक्ति घुली हुई है। यहां स्थापित मंदिर को 'सिद्ध पीठ' माना जाता है।
गढ़पहरा (जिसे पुराना सागर भी कहा जाता है) की विंध्य पर्वत शृंखलाओं पर स्थित यह मंदिर अपनी ऊंचाई और भव्यता के लिए विख्यात है। मंदिर का शिखर दूर से ही श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करता है। हनुमान जी की प्रतिमा अत्यंत सौम्य किंतु तेजस्वी है, जो भक्तों में निर्भयता का संचार करती है। यहाँ की प्राकृतिक सुंदरता मंदिर की दिव्यता को और बढ़ा देती है, जहाँ प्रकृति स्वयं बजरंगबली की आरती उतारती प्रतीत होती है।
आस्था का जाग्रत केंद्र: सिद्ध हनुमान मंदिर और लोक कथाएँ
पहाड़ की सबसे ऊँची चोटी पर विराजे प्राचीन हनुमान जी का मंदिर यहाँ की आत्मा है। इस सिद्ध पीठ की महिमा को लेकर क्षेत्र में कई पुरानी लोक कथाएँ प्रचलित हैं। बुजुर्गों की मानें तो यह मंदिर साक्षात चमत्कार का स्थल है। एक प्राचीन किंवदंती के अनुसार, दुर्ग पर आने वाले किसी भी अज्ञात संकट की सूचना हनुमान जी अदृश्य रूप में राजा को दे दिया करते थे। आज भी स्थानीय जनश्रुति है कि रात के पहर में पहाड़ पर शंख और नगाड़ों की ध्वनि सुनाई देती है, जिसे 'देव आरती' माना जाता है। आषाढ़ मास में लगने वाला भव्य मेला और 'निशान' (ध्वजा) चढ़ाने की परंपरा इस स्थान की धार्मिक महत्ता को और भी प्रगाढ़ करती है। भक्तों का अटूट विश्वास है कि यहाँ सच्चे मन से की गई अर्जी कभी खाली नहीं जाती, यही कारण है कि इसे 'सिद्ध पीठ' के रूप में पूजा जाता है।
आषाढ़ मेला: संस्कृति और श्रद्धा की अविरल धारा
गढ़पहरा की पहचान यहाँ आयोजित होने वाले भव्य आषाढ़ मेले से और भी प्रगाढ़ हो जाती है। वर्षा ऋतु के आगमन के साथ जब प्रकृति अपनी हरियाली की चादर ओढ़ती है, तब आषाढ़ माह में हर मंगलवार को यहाँ भक्ति का सैलाब उमड़ता है। यह मेला केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि बुंदेली लोक संस्कृति का दर्पण है। दूर-दराज के गाँवों से किसान अपनी नई फसल की सुख-समृद्धि की कामना लेकर 'निशान' (ध्वजा) चढ़ाने पैदल आते हैं। मेले में गूँजते बुंदेली भजन, फाग और ढोलक की थाप आधुनिकता के इस दौर में भी हमारी जड़ों की मजबूती का अहसास कराती है।
शौर्य का प्रतीक: गढ़पहरा का अभेद्य किला
गढ़पहरा का किला बुंदेली वास्तुकला और सामरिक दूरदर्शिता का अद्भुत उदाहरण है। 11वीं शताब्दी से लेकर 16वीं शताब्दी तक दांगी शासकों का केंद्र रहा यह दुर्ग, अपनी सुरक्षा संरचना के लिए विख्यात था।माना जाता है कि उस दौरान यह क्षेत्र बुंदेलखंड की राजनीति का केंद्र था। किले के अवशेष आज भी उस काल के वैभव की कहानी सुनाते हैं। ऊँची प्राचीरें और पत्थरों पर की गई नक्काशी यह बताती है कि यह स्थान कभी राजनीतिक सत्ता का प्रमुख केंद्र हुआ करता था। इतिहासकार मानते हैं कि राजा पृथ्वी सिंह के शासनकाल में इस किले ने अपनी भव्यता के चरम को छुआ था। ऐतिहासिक मान्यता है कि यहाँ के शासकों ने अपनी सुरक्षा और आध्यात्मिक शांति के लिए इस सिद्ध पीठ की स्थापना की थी। मंदिर की बनावट और यहाँ मिले अवशेष बताते हैं कि यह स्थान सदियों से तपस्वियों की साधना स्थली रहा है।
स्थापत्य का सौंदर्य: रहस्यमयी शीश महल
किले के भीतर स्थित 'शीश महल' पर्यटकों और इतिहास प्रेमियों के लिए विशेष कौतूहल का विषय है। हालाँकि समय की मार ने इसे प्रभावित किया है, लेकिन इसकी संरचना में झलकी भव्यता आज भी स्पष्ट है। इसे राजाओं के निवास और आमोद-प्रमोद के लिए बनाया गया था। महल की दीवारों पर काँच के बारीक काम और झरोखों से दिखने वाला विहंगम दृश्य इसे अद्वितीय बनाता है। यह महल उस दौर की विलासिता और कलात्मक रुचि का परिचायक है, जो आज एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक धरोहर के रूप में खड़ा है।
सामाजिक समरसता का केंद्र
धार्मिक महत्व से परे, गढ़पहरा मंदिर सामाजिक एकता का एक अनुपम उदाहरण है। यहाँ के भंडारों और मेलों में जाति, धर्म और वर्ग का भेद पूरी तरह मिट जाता है। यह स्थान सागर के लोगों के लिए केवल एक पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि एक भावनात्मक जुड़ाव है, जहाँ हर मंगलवार और शनिवार को आस्था का लघु कुंभ दिखाई देता है।
पर्यटन स्थल के रुप में मिलती पहचान: 'मिनी पचमढ़ी' का अहसास
वर्तमान में गढ़पहरा एक प्रमुख पर्यटन स्थल के रूप में भी उभर रहा है। वर्षा ऋतु के दौरान जब पूरी पहाड़ी हरियाली की चादर ओढ़ लेती है, तब यहाँ का दृश्य किसी हिल स्टेशन से कम नहीं लगता। ऊँची पहाड़ियों पर स्थित होने के कारण यह ट्रेकर्स के लिए पसंदीदा स्थान है। वहीं शहर के शोर-शराबे से दूर, यह स्थान शांति और अध्यात्म की खोज करने वालों के लिए स्वर्ग समान है।
गढ़पहरा का यह परिसर हमारी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहर है। आस्था का केंद्र हनुमान मंदिर, शौर्य का प्रतीक किला और सौंदर्य का दर्पण शीश महल—ये तीनों मिलकर सागर को एक विशिष्ट पहचान देते हैं। आषाढ़ की रिमझिम फुहारों के बीच गढ़पहरा की यात्रा एक ऐसा अनुभव है, जो भक्ति और इतिहास को एक सूत्र में पिरो देता है।





शासकीय पंडित रविशंकर शुक्ल निर्धन विद्यार्थियों के अध्ययनन हेतु श्रेष्ठ संस्थान - विधायक श्री शैलेंद्र जैन

सागर 01 अप्रैल 2026
विद्यार्थी पालक एवं शिक्षकों की प्रवेश उत्सव पर उपस्थित देखकर विधायक शैलेंद्र जैन ने कहा कि शासकीय पंडित रविशंकर शुक्ल विद्यालय न केवल अध्ययन-अध्यापन में उत्कृष्ट परीक्षा परिणाम निरंतर दे रहा है वरन खेल, सांस्कृतिक कार्यक्रम, बाल-रंग, कला-उत्सव, शैक्षणिक भ्रमण बेंगलुरु, मणिपुर एवं संभाग में मुख्यमंत्री लैपटॉप योजना अंतर्गत सर्वाधिक लैपटॉप विद्यार्थी को मिलने पर शुभकामनाएं दी।

विधायक श्री जैन ने कहा कि स्टाफ, पालक एवं विद्यार्थियों का प्रवेश उत्सव में आज जो उत्साह एवं उत्सव है वह प्रशंसनीय है  एवं अद्वितीय है विशिष्ट अतिथि एसबीआई बड़ा बाजार के ब्रांच मैनेजर श्री पद्माकर निनावने ने कहा कि मैं निरंतर इस विद्यालय में आता रहता हूं यहां के शिक्षक कड़ी मेहनत करते हैं मैं प्रवेश के प्रथम दिवस इतना बड़ा उत्सव कभी नहीं देखा एवं विद्यार्थियों को विषय चयन व बैंकिंग के संबंध में बताया विद्यालय की उप्राचार्य श्रीमती रंजीता जैन ने प्रतिवेदन प्रस्तुत करते हुए कहा कि विद्यालय के शिक्षक विद्यालय के बाद गृह संपर्क में भी अध्यापन कराते हैं।

इस कार्यक्रम में 800 से अधिक विद्यार्थी एवं 194 अभिभावक उपस्थित रहे कार्यक्रम के आरंभ में सांकेतिक रूप से ताले में चाबी लगाकर विधायक जी ने प्रवेश उत्सव का उद्घाटन किया कक्षा 9वीं 11वीं के टॉपर विद्यार्थियों को क्राउन, सैशे एवं माला पहनाकर सम्मानित किया निःशुक्ल पाठ्य पुस्तक एवं साइकिलों का वितरण किया। विद्यालय में स्वेच्छा से सेवानिवृत के उपरांत कार्य करने वाले शिक्षक श्री सीताराम मिश्रा, श्री धनीराम ललिया एवं श्रीमुन्नालाल विश्वकर्मा जी का विधायक द्वारा सम्मान किया गया।

 इस अवसर पर सर्वाधिक महत्वपूर्ण कार्य करने वाले एक शिक्षक श्री संगीत तिवारी को विद्यालय प्रबंधन द्वारा प्रशस्ति पत्र एवं विधायक द्वारा सम्मानित किया गया जो दिनांक 31 मार्च को अवकाश दिवस में भी आरटीई पंजीयन की अंतिम तारीख होने पर विद्यालय में उपस्थित होकर पंजीयन करते रहे। विद्यालय के भृत्य श्री महेश अहिरवार का कार्यक्रम में जन्म दिवस मनाया गया। सभी विद्यार्थियों पर विधायक एवं अतिथियों द्वारा पुष्पवर्षा कर आत्मीय सम्मान किया गया। अतिथियों के स्वागत का संपूर्ण दायित्व वरिष्ठ शिक्षिका श्रीमती मालिनी जैन, श्रीमती मधुलिका जैन, श्रीमती प्रीति तिवारी, श्रीमती रश्मि साहू एवं श्रीमती नेहा सोनी का रहा।  साईकिल वितरण की जिम्मदारी सुश्री अर्चना कुशवाहा ने निभाई। सेवानिवृत्त शिक्षकों के सम्मान श्री सुमित सिंह राठौड एवं श्रीमती ज्योति गोदरे द्वारा किया गया।

 कार्यक्रम का संचालन डॉ. शुभा मिश्रा एवं डॉ. नाहिद परवीन द्वारा किया गया कार्यक्रम की सम्पूर्ण व्यवस्था श्रीमती रिंकी राठौर ने देखी। अतिथियों का स्वागत श्री राकेश शांडिल्य, श्री अनिल लोधी, श्री संदीप राय, श्री आकाश चौरसिया, श्री नीरज पुरी गोस्वामी आदि द्वारा किया गया। मुख्यमंत्री जी के कार्यक्रम का सीधा प्रसारण देखने की संपूर्ण व्यवस्था श्री अशोक पटैल ने की। मंच सज्जा का संपूर्ण दायित्व श्रीमती सरोज जैन, डॉ. ख्याति बेलापुरकर एवं श्रीमती मीनाक्षी पटैल का रहा। श्रीमती ज्योति नेमा एवं श्रीमती सुमन सेन ने मार्गदर्शन में छात्राओं ने रंगोली बनाई।

 छात्राओं एवं अभिभावकों की बैठक व्यवस्था श्री राजू अहिरवार, श्री एल.पी. तिवारी, श्री करन पटैल आदि द्वारा देखी गई। पुस्तक वितरण श्रीमती कीर्ति चढ़ार तथा विद्यार्थी पुरस्कार वितरण का कार्य श्रीमती पिंकी अजीज, नीलोफर खान, श्रीमती रितु कटारे, श्रीमती पूजा खरे द्वारा किया गया। कार्यक्रम में फोटोग्राफी का कार्य श्री शशांक धूपड़ एवं श्री जितेन्द्र रजक ने किया। प्रवेशोत्सव कार्यक्रम के उपरांत श्रीमती कीर्ति पचौरी के सहयोग से कक्षा 11वीं की छात्राओं द्वारा कक्षा 12वीं की छात्राओं को फेयरवेल कार्यक्रम आयोजित किया गया। शैक्षणिक व सहशैक्षणिक गतिविधियों में संपूर्ण वर्ष उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाली छात्राओं को मिस फेयरवल चुना गया एवं प्राचार्य डॉ. महेन्द्र प्रताप तिवारी ने आभार व्यक्त किया एवं अप्रैल माह में प्रत्येक दिवस शाला आने को प्रेरित किया। 

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